Tuesday, 5 December 2017

गुजरात चुनाव 2017 – कौन होगा विजेता?




                                                          

गुजरात में शीघ्र ही वर्ष 2017 के चुनाव होने वाले हैं। मतदान के पहले दौर के लिए आठ दिन से भी कम समय है और चुनाव प्रचार का बिगुल थमने में सप्ताह भर से भी कम समय है।

यदि वर्ष 2012 को देखें तो भाजपा ने 182 में से 116 सीटें जीती थीं जबकि काँग्रेस ने 60 सीटों पर कब्जा किया था। प्रदेश में रिकॉर्ड तोड 71.32 % मतदान हुआ था। भाजपा को मिलने वाले मतों की हिस्सेदारी 47.9 % थी जबकि काँग्रेस के हिस्से केवल 38.9 % मत थे। भाजपा और काँग्रेस के बीच मतदाताओं के हिस्से का अंतर वर्ष 2007 में 9.49 % से घटकर वर्ष 2012 में 9 % रह गया था इसकी प्राथमिक वजह काँग्रेस के पुराने जुझारू कार्यकर्ता केशुभाई पटेल द्वारा नए दल का निर्माण था जिससे मतदाताओं का 3.6% हिस्सा उनके पास चला गया था।
जीडीपी विकास दर के संदर्भ में गुजरात ने लगातार कई राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है। राज्य का बुनियादी ढाँचा पूरे देश में सबसे अच्छा है। गुजरात के 18,066 गाँवों में से 17,856 गाँवों की 98.84 % जनता के पास पक्की सड़क है। आँकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि हमारे देश के अन्य राज्यों की तुलना में गुजरात में कानून और व्यवस्था की स्थिति अधिक बेहतर है। शिक्षा और स्वास्थ्य-सुरक्षा के क्षेत्र में अधिक निवेश की आवश्यकता हो सकती है, बावज़ूद यह तो मानना होगा कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में यहाँ के हालात काफी अच्छे हैं। आपको भारत में अहमदाबाद और सूरत के अलावा और कहाँ रोशनी से जगमगाते ऐसे प्रशस्त नदी पाट दिखाई देते हैं? 

दोनों प्रमुख दल, चाहे भाजपा हो या काँग्रेस, मतदाओं का ध्यान खींचने के लिए अलग से कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं क्योंकि उनके राजनीतिक कार्यकर्ताओं और प्रेस ने “पंच वार्षिकी” तर्ज पर पहले से ही यह काम कर रखा है। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री ने नेतृत्व संभाल लिया है। ज़ाहिरन वे अपने गृह राज्य से जीत सुनिश्चित करना चाहेंगे।

राहुल गाँधी अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को फेंकने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं, कई बार इसके लिए वे बेतुके सवाल तक पूछ बैठते हैं, इस तरह के सवाल पूछना गुजरात के मतदाओं के औसत ज्ञान पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा है। उन्होंने वादा किया है कि वे सत्ता में आने के दस दिनों के भीतर ही सारे ऋण माफ़ कर देंगे (मैं हैरान हूँ कि चुनाव आयोग इसे मतदाओं को पैसे का लालच देने के रूप में क्यों नहीं देख पा रहा)

काँग्रेस के नव अध्यक्ष ने कोई भी ‘पत्थर’ ऐसा नहीं छोड़ा है, जिसके आगे सिर न झुकाया हो और वे हर हिंदू भगवान् से आशीर्वाद माँग रहे हैं। पिछले कुछ महीनों या कि कुछ सालों या किसी भी राज्य के चुनाव से पहले तक उन्होंने इतने मंदिरों के दर्शन नहीं किए होंगे जितने इन दिनों वे गुजरात के मंदिरों में जा रहे हैं। आखिर हो भी क्यों न, गुजरात चुनावों के ठीक पहले काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष होने का ताज जो उन्हें मिला है!

एक ओर जहाँ भाजपा प्रश्न पूछ रही है कि राहुल गाँधी के कर्मचारियों ने सोमनाथ मंदिर में उनका नाम गैर-हिंदूओं के रजिस्टर में क्यों लिखा, वहीं कपिल सिब्बल और भी ‘हास्यास्पद’ बात कर रहे हैं, जब श्री सिब्बल प्रधानमंत्री को ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत करते हैं जो हिंदू नहीं है!! दूसरी ओर, काँग्रेस के प्रवक्ता पुरानी तस्वीरों को दिखाकर एक-दूसरे पर ही हल्ला बोल कर यह सिद्ध कर रहे हैं कि उनके नेता ब्राह्मण और तो और शैव हैं! 

इसी के साथ पाटीदारों के लिए आरक्षण लाने (इसे भले ही अनुमति न मिली हो) वाला हार्दिक पटेल है, जो यह अच्छी तरह से जानता है कि आरक्षण चाहने वाले स्वार्थी मतदाता बहुत कम है पर मीडिया में अपने दोस्तों की वजह से इसी बात का बहुत शोर करता है। अंतत: ‘आप-आम आदमी पार्टी’ भी एक तरफ बैठी है यह सोचकर की वह चुनाव के खेल को बिगाड़ सकती है जबकि उनके नेता खुद जानते हैं कि वे एक सीट जीतने तक की उम्मीद नहीं कर सकते हैं।

जैसे कि हर चुनाव के समय होता है छोटे पर्दे पर इस तरह बहस चल रही है जैसे हारने वाले के लिए मौत की घंटा हो, जबकि एक बार परिणाम आ जाने के बाद वे भी भूल जाएँगे कि उन्होंने क्या कहा था। 

इन सबके बीच निश्चित ही मतदाता भी है जो जानता है कि मतपत्र के माध्यम से वह अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकता है। बिल्कुल, मतदाता, जो विमुद्रीकरण (नोट बंदी) से आहत हुआ है लेकिन जो प्रधानमंत्री द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण कदम की आवश्यकता को पहचानता है और उनका समर्थन भी करता है। बिल्कुल,वही मतदाता जिसने जीएसटी लागू होने के दर्द को झेला है पर देश में इस एकल कर के दीर्घकालिक लाभों को भी वह जानता है। और बिल्कुल, साथ ही प्रदेश में विरोधी लहर का भी असर है।    

तो गुजरात के मतदाताओं की क्या प्रतिक्रिया होगी?

क्या वे भाजपा के लिए मतदान करेंगे और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति भरोसा जताएँगे जैसे वे सालों से करते आए हैं? या वे काँग्रेस को मत देंगे और उम्मीद करेंगे कि पूरी तरह से नावाकिफ़ राहुल गाँधी जादू की कोई छड़ी घूमाकर गुजरात राज्य के लिए ऐसा कुछ कर दें जिसे वे अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी के लिए कर पाने में असमर्थ रहे? या वे मतदान करने के अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए “नोटा- उपरोक्त में से कोई नहीं” के लिए मत डालेंगे? हार्दिक पटेल, आम आदमी पार्टी और अन्य दलों के प्रभाव को भी नाकारा नहीं जा सकता लेकिन उनमें से किसी का भी बहुत ज़्यादा प्रभाव भाजपा पर नहीं पड़ेगा। 

मेरा मानना है कि गुजरात के मतदाता भले ही समर्थन देते हो पर विमुद्रीकरण और जीएसटी से परेशान हैं और भाजपा को परेशानी में डाले बिना वह अपनी नाराज़गी प्रकट करना चाहेंगे। जीएसटी दाखिले से जिस तरह सारे व्यवसाय सार्वजनिक तौर पर लोगों के सामने आ रहे है इस विचार से हो सकता है मतदाता नाख़ुश हो। तब भी वे पहचानता हैं कि भारत और गुजरात के लिए एक स्थायी उम्मीद भाजपा और मोदी है। निश्चित ही काँग्रेस और राहुल गाँधी नहीं।  

भाजपा से नाराज़ मतदाता हो सकता है अपना विरोध प्रकट करने के लिए मतदान के लिए न जाएँ। मतदाताओं का यह तरीका हो सकता है भाजपा को दंडित करने और अपना क्रोध दर्शाने का। इस वजह से इन चुनावों में हमें मतदान में गिरावट दिखाई देगी। भाजपा और काँग्रेस के बीच का फासला शायद और कम नज़र आए, अगरचे यह 2022 को ध्यान में रख बहसों और लेखों का विषय भी हो सकता है।

यद्यपि भाजपा की झोली में आने वाले मतों की संख्या कम हो सकती है, पर भाजपा को मिलने वाली सीटों में वृद्धि होगी। हमारे लोकतंत्र की प्रणाली यही है कि "सबसे अधिक मत पाने वाला प्रत्याशी ही चुनाव में विजयी होता है" और इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा होगी।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं। वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।
                       
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Sunday, 3 December 2017

सेवानिवृत्ति और आपके जीवन साथी के साथ संबंध - भाग 1


जब आप सेवानिवृत्त होते हैं, आपका बॉस बदल जाता है। किसी समय आपका बॉस वह था जिसने आपको नौकरी दी थी, अब आपका बॉस वह होता है, जिससे आपने शादी की। किसी ने ठीक ही कहा है, शादी, उस शराब की तरह है, जो जैसे-जैसे पुरानी होती चली जाती है, उसका नशा वैसे-वैसे ही बढ़ता जाता है।

आपकी सेवानिवृत्ति की अवधि तक आपकी शादी के लगभग तीन दशक हो चुके होते हैं। आपको लगने लगता है कि आप एक-दूसरे को बख़ूबी समझने लगे हैं, वैसे भी उन दिनों आप अपने-अपने करियर में इतने व्यस्त रहते हैं कि वास्तव में आपके पास एक-दूसरे को देने के लिए उतना समय भी नहीं होता है। आप अपने पूरे वैवाहिक जीवन में एक-दूसरे की निजता का सम्मान करते हैं और कभी एक-दूसरे के आड़े नहीं आते, आप गंभीर मसलों को दबे-छिपे रहने देते हैं। अब आपको लगता है कि पिछले तीन दशकों से आप अपने साथी के साथ जिस तरह दिन के पूरे 24 घंटे बिताना चाहते थे, वह समय गया है लेकिन आप यह जानकर हैरत में पड़ जाते हैं कि जैसा आपको लगता था कि आप अपने साथी को पूरा जानते हैं, क्या आप वैसा सच में अपने साथी को पहचानते भी हैं, या नहीं?

कई नाख़ुश युगलों की समस्या तब शुरू होती है, जब सेवानिवृत्ति को लेकर उनकी अपेक्षाएँ समान नहीं होती हैं और यह तब और भी बढ़ जाती है जब वे इस बारे में कभी बात तक नहीं करते। कुछ लोगों के लिए यह कुछ रोमांचक करने का बहुप्रतीक्षित समय होता है, वे अपने प्रियजनों के साथ अपने रिश्तों में नयापन लाना चाहते हैं या उसे मजबूत करना चाहते हैं और नए उद्देश्य तलाशते हैं। जबकि दूसरों के लिए इसका अर्थ कंप्यूटर के सामने या गोल्फ़ के मैदान में आराम से ढेर सारा समय बीताना हो सकता है।

एक-दूसरे को हलकान कर छोड़ने की बजाए, अच्छा हो कि दंपत्ति अपने भविष्य के लिए कोई ऐसी योजना बनाए, जिस पर दोनों की आपसी सहमति हो। उन्हें इस बारे में सोचने और चर्चा करने की ज़रूरत है कि वे कितना समय साथ में व्यतीत करना चाहते हैं और उसे किस तरह से गुज़ारना चाहते हैं। यह संवाद आप दोनों को सेवानिवृत्ति से बहुत साल पहले शुरू कर देना चाहिए।

सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद के कुछ सालों में नोंक-झोंक-तकरार होना बहुत ही आम है। शादी का तनाव तब और भी गहरा हो जाता है यदि दोनों में से कोई एक पहले सेवानिवृत्त होता है। विवाह एक संस्था है, जिसे बनाए रखने के लिए किसी को पूरे जीवन उस पर काम करते रहना पड़ता है, कि सेवानिवृत्ति तक उसे ऐसे ही अनदेखा पड़े रहने दिया जा सकता है। सेवानिवृत्ति के बाद कई जोड़े एक-दूसरे के साथ अपना समय बहुत ख़राब तरीके से बिताते हैं क्योंकि वे एक-दूसरे के साथ निबाह नहीं कर पाते। हमारे कई ऐसे दोस्त हैं जिन्होंने सेवानिवृत्ति की उम्र में जब उनके बच्चे अपनी-अपनी ज़िंदगी में लग गए थे, अपनी अलग दुनिया बसाना पसंद किया या कोई दूसरा जीवनसाथी चुन लिया।

यहाँ तक कि वे शादियाँ जो नौकरी-चाकरी के दिनों में बनिस्बत ठीक जान पड़ती थीं, उनमें भी किसी किसी कारण झगड़े होना शुरू हो जाते हैं क्योंकि पति-पत्नी अब हर दिन एक-दूसरे के साथ बहुत-सारा समय बीताने लगते हैं।

इसकी वजह है कि सेवानिवृत्ति, वैवाहिक जीवन के कई पहलुओं में बदलाव ले आती हैं और कई चीज़ें खुद को भी बदलनी पड़ती है।

अमेरिका, यूरोप और जापान मेंसेवानिवृत्त पति सिंड्रोम (रिटायर्ड हसबैंड सिंड्रोम- आरएचएस)” बहुत चर्चित विषय है, यहाँ तक कि इस विषय पर शोध प्रबंध तक लिखे गए हैं। कुछ जापानी महिलाएँ तो अपने सेवानिवृत्त पतियों को सोधीगोमीया कि कहे भारी-भरकम अटालातक कहती हैं। अमेरिकी और यूरोपीय महिलाओं के पास भी इसके लिए ऐसा ही कोई शब्द होगा। पुरुष के सेवानिवृत्त होने के बाद दोनों के लिए जीवन बदलता है और सेवानिवृत्ति के बाद के पहले कुछ वर्षों में ही कई महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़ते हैं।

अब यह बात असामान्य नहीं रही कि जो दंपत्ति अपने कामकाजी जीवन में साथ रहते थे उन्होंने बुढ़ापे में "ग्रे" तलाक का निर्णय ले लिया हो। जिन समस्याओं को आम तौर परकाम के नाम परदरकिनार कर दिया था अब उनके फन उभरने लगते हैं क्योंकि अब पर्याप्त समय होता है और दंपत्ति जानते हैं कि उनके पास इन समस्याओं से दो-चार होने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं बचा है।

यदि आप झटपट यह जानना चाहते हैं कि आप और आपका साथी एक-दूसरे के कितने अनुकूल हैं, तो एक-दूसरे के साथ सप्ताह के सातों दिन, 24 घंटे साथ रहकर देखिए। समस्याएँ ख़ुद--ख़ुद मुँह-बायें खड़ी होने लगेंगी। यही वह परीक्षा है जिसका सामना दंपत्तियों को आम तौर पर सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद करना पड़ता है। जिन सालों में पति-पत्नी ने स्वतंत्र जीवन शैली को जीया था उसकी तड़प उन्हें उस दिन होती है, क्योंकि उन्हें इस सच्चाई का सामना करना पड़ता है कि उन दोनों के बीच कुछ भी समान नहीं है। पूरे वैवाहिक जीवन में वे आपस में कोई भी समान रूचि पैदा करने में नाकाम रहे हैं- उन्होंने आपसी सामंजस्य को बनाने के लिए कुछ नहीं किया होता। आपसी सम्मान और संवेदनशीलता पर कोई रिश्ता खड़ा करने की बजाए उन्होंने एक-दूसरे की भावनाओं को नज़रअंदाज़ किया और वैवाहिक जीवन को ही पूरे जीवनभर के लिए खो दिया।

हाल ही में सेवानिवृत्त हुए एक दोस्त ने टिप्पणी की, “सेवानिवृत्ति से पहले मेरी पत्नी मुझसे मदद माँगती तो मैं अनिच्छा से उसका काम करता था। अब वह कहती है कि मुझे क्या करना चाहिए क्योंकि मेरे पास करने के लिए और कुछ नहीं है और उसका ऐसा कहना मुझे बहुत बुरा लगता है।

किसी महिला के नज़रिए से देखे तो वह कहेगी, “आपके पति की सेवानिवृत्ति के बाद, मानो आपको दोगुना पति मिल जाता है, और वेतन आधा।यह बहुत ही हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा गया वक्तव्य है। जबकि एक वृद्धा ने कहा, “कभी-कभी मैं सुबह झुंझलाहट के साथ उठती हूँ। किसी दिन मैं पति को सोने देती हूँ!”

मैंने अपने उन दोस्तों के सामने, जो अभी-अभी सेवानिवृत्त हुए, जिस सबसे बड़ी चुनौती को देखा वह है समय, जिसे उन्हें अपने जीवन साथी के साथ बीताना था। अधिकांश युगलों में जिनकी शादी को अभी तीन दशकों से कुछ अधिक हुए हैं, उन्होंने जीवनसाथी के साथ जो पहले समय बीताया था वह तब था, जब बच्चे साथ में थे, ऐसा तब तक रहा,जब तक बच्चे महाविद्यालय या काम की वजह से कहीं और चले गए हो, पर उसके बाद भी वे उसी वक्त साथ होते थे जब फुर्सत के पल हो जैसे सुबह की चाय का समय या रात्रि के भोजन का समय। ध्यान दीजिए, शादी के लगभग तीन दशक बाद आप दोनों में से कोई भी इस स्थिति में नहीं है कि दूसरे इंसान की विचार शैली को बदल सके या बदलने की कोशिश तक कर पाए।

पूरा दिन घर पर रहकर बिताने का विचार करना भी एक चुनौती है, जिसे सोचना भी दुर्गम लगता है। आप दोनों एक दूसरे के साथ दिन के 24 घंटे कैसे बीता सकते हैं, वह भी एक ही जगह रहकर और तब भी कोशिश करें कि एक-दूसरे के पास खुद की एकांत की पर्याप्त जगह हो।

मैंने पति-पत्नी दोनों के मुँह से कई बार यह आम बात सुनी है किपता नहीं, हम लोग सेवानिवृत्ति के बाद कैसे जी सकेंगे।

आप दोनों के बीच यह समायोजन बैठा पाना एक चुनौती है, जिसके पार करना होगा। यदि आपका जीवनसाथी कामकाजी है और अभी तक सेवानिवृत्त नहीं हुआ है, तो आपको कुछ और घरेलू जवाबदारियों संभालने की तैयारी दिखानी होगी। यदि वह कामकाजी नहीं है तो घर के उसके कुछ कामों में हाथ बँटाना होगा, जो हो सकता है आपने पहले कभी किए हो। युगलों को पता चलता है कि वे एक-दूसरे के उतने अनुकूल नहीं है जितना उन्हें पहले लगता था क्योंकि उन्हें अब पूरे दिन एक-दूसरे का सामना करना पड़ता है।

मेरी पत्नी ने पूछा, "आज आप क्या कर रहे हो?"
मैंने कहा कुछ नहीं "
उसने पूछा, "जो कल कर रहे थे उसका क्या हुआ"
मैंने कहा, "वह अभी तक पूरा नहीं कर पाया"

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए सामाजिक तौर पर जुड़े रहना बहुत ज़रूरी है। अधिकांश सुखी सेवानिवृत्त दंपत्ति वे देखे गए हैं जो कई दोस्तों के साथ बड़ी सक्रियता से अपना सामाजिक जीवन गुज़ारते हैं। महिलाएँ इसे बड़ी आसानी से अपना लेती है और वे आम तौर पर समाज से अधिक जुड़ी भी होती हैं, उनके दोस्तों और परिवार के साथ भावनात्मक संबंध बनिस्बत अधिक मज़बूत होते हैं। पुरुषों के लिए महिलाओं की तुलना में सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन अधिक कठिन होता है, इसकी एक प्राथमिक वजह तो यह है कि वे जीवन के शुरुआती समय से ही कभी गहराई से रिश्ते निभाने को लेकर अधिक चिंतिंत नहीं होते। पुरुष सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक बने रहने के लिए अपने साथी पर अधिक निर्भर रहते हैं और बहुत हद तक वे इसकी ऐसी माँग भी करते हैं।

अपने पूरे कामकाजी जीवन में आप दोनों अपने काम और बच्चों से बेहताशा घिरे रहे होंगे। पहला बदलाव तो आपको तभी दिखाई देगा जब आपके बच्चे स्कूली पढ़ाई के बाद घर के बाहर कदम रखेंगे। चाहे वे आपके ही देश के किसी महाविद्यालय में पढ़ने के लिए जाएँ या विदेश जाएँ, इतना तो तय है कि उन्होंने घर से उड़ान भर ली है और वे अपने जीवन में आगे बढ़ने लगेंगे। यह पहला समायोजन है जिससे अधिकांश दंपत्तियों को आगे जाना पड़ता है क्योंकि अब वे भी ऐसे माँ-बाप हो जाते हैं जिनके बच्चे बड़े होकर उनसे अलग हो गए हो, “खाली नस्लबनने की आशंका को झुठलाया नहीं जा सकता। हालाँकि अपने व्यस्त कार्यकाल और सामाजिक तानेबाने में आप दोनों इस बदलाव को आसानी से पार कर जाते हैं। 

दूसरा बड़ा बदलाव तब होता है जब आप सेवानिवृत्त होते हैं। अचानक आप दोनों घर पर होते हैं और जब कई बदलावों के अनुरूप खुद को ढालने की कोशिश में होते हैं तब आप दोनों अपने रिश्ते में भी कुछ जगह तलाशते हैं। आप दोनों के बीच जितने भी मसले रहे हो उन्हें भूल जाइए और अपने जोड़ीदार को अपने आगे के पूरे जीवन के साथी के रूप में देखिए। किसी दूसरे साथी को खोजना जो आपके हर पागलपन और ग़लतियों को स्वीकार करने की तैयारी रखें और आपके साथ एक ही छत के नीचे रहने के लिए तैयार हो, काफी मुश्किल है।

योजना बनाइए,लेकिन योजनाओं की अति मत कीजिए ही अपने या एक-दूसरे के रोज़मर्रा के जीवन में भारी फेर-फार कीजिए। थोड़ा समय खाली छोड़ दीजिए, शायद कुछ अप्रत्याशित हो जाए या फिर कभी कहीं यूँ ही घूमने निकल जाइए।

इससे आप वास्तव में अपने सेवानिवृत्त साथी के अपने आस-पास के साथ को पसंद करने लगेंगे और अगले कई सालों तक उसके साथ की चाहत को बरकरार रख पाएँगे।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं। वे बेस्ट सेलर पुस्तकों रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

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