Friday, 16 March 2018

उ.प्र. उप-चुनाव - धारणा बनाम वास्तविकता



उत्तरप्रदेश के उप-चुनावों में भाजपा ने दो सीटें गंवा दीं तो तुरंत चाकू-खंजर बाहर गए। पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में कुछ हफ्ते पहले ही जीत दर्ज की थी और तब ईवीएम के दोषों पर बात करने के अलावा सबकी बोलती बंद थी।
                                                               
विपक्षी दल वर्ष 2019 के चुनावों में भारी जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं पर केवल तभी यदि वे अपने सभी मतभेदों को हल कर सकें और केवल तभी यदि वे एक मंच पर साथ सकें और केवल तभी यदि भारत पर राज करने के लिए वे अपने सारे मतभेदों को भूलाकर एक साथ रहने में सक्षम हो सकें।

ममता बनर्जी का कहना है कि "अंत की शुरुआत हो गई है।" राहुल गांधी ने घोषणा की है कि "मतदाता भाजपा से नाराज हैं", पर ऐसा कहते हुए वे यह भूल रहे हैं कि इन चुनावों में उनके उम्मीदवारों को जमानत राशि तक से हाथ धोना पड़ गया था। लगभग सभी विपक्षी नेता उत्साह में आकर अपने हाथ सेंक रहे हैं और कुछ पत्रकार पहले ही अनुमान लगा रहे हैं कि हम अगले साल एक नया सत्तारूढ़ गठबंधन देखेंगे।

मुझे आश्चर्य होता है कि इन राजनेताओं और पत्रकारों में इतना उत्साह कहाँ से आता है और हर चुनाव के बाद वे कितनी आसानी से अपनी मनोदशा बदल लेते हैं। मुझे तो इससे भी हैरत होती है कि पता नहीं उन्हें कहाँ से "अलार्म घंटियाँ" सुनाई देने लगी हैं। प्रधान मंत्री मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2014 से पूरे देश में व्याप्त भाजपा लहर की तेज हवाओं में वे भूसे से चिपके हैं।

भाजपा का हर नुकसान उनके लिए उत्सव मनाने का कारण होता है और हर किसी के लिए यह मौत की घंटी बजने जैसा होता है। भाजपा की हर जीत पर वे कारण मीमांसा करने लगते हैं कि क्या गलत हुआ और क्या हो सकता था।

जबकि दूसरी ओर, योगी आदित्यनाथ ने जनादेश को स्वीकारा है और कहा है कि वे आत्मनिरीक्षण करेंगे और आगे की योजना बनाएँगे। इन चुनावों में हार से उन्हें चोट लगी होगी ख़ासकर तब सबसे ज़्यादा जब जिस गोरखपुर निर्वाचन क्षेत्र का उन्होंने लगातार 5 साल प्रतिनिधित्व किया हो। लेकिन अपनी हार को उन्होंने विनीत भाव से लिया। उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी हार में पार्टी कारक नहीं है जबकि उनके दो विपक्षी दलों के गठबंधन की प्रतिक्रिया से यह पूरी तरह भिन्न है। उन्होंने यह भी स्वीकारा कि इन चुनावों में उनकी पार्टी और उनके कार्यकर्ताओं को अति विश्वास था।
                                                               
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जीतने वाले दो उम्मीदवारों को बधाई दी है। यह कुछ ऐसा है जिसे किसी विपक्षी दल ने इतने सालों में कभी नहीं सीखा, जब भी उन्हें अपमानजनक नुकसान का सामना करना पड़ा हो।

यह पिछले चुनावों के विपरीत है जब विपक्षी दलों ने खुद के अलावा अपने नुकसान के लिए शेष सभी को और हर चीज को दोषी ठहराया था, मैंने किसी भी भाजपा प्रवक्ता को यह कहते नहीं सुना कि ईवीएम इसके लिए जिम्मेदार है या यह कोशिश की हो कि वे सिद्ध करें कि वे क्यों हार गए।

काफी स्पष्ट रूप से यह दिखता है कि भाजपा को हराने के एकमात्र उद्देश्य से दो कट्टर प्रतिद्वंदी, समाजवादी पार्टी (एसपी) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) साथ आए थे तब समझ आता है कि ये 2 सीटें मतदान प्रक्रिया का सामान्य विचलन है।         इन चुनावों में बुआ और भतीजे के बीच क्या समझौता हुआ उसे वे निश्चित रूप से बहुत गुप्त रखेंगे! बीएसपी को प्रासंगिक बने रहने के लिए राज्यसभा में कुछ सीटों के लिए बेतहाशा सशक्त समर्थन की दरकार है और ऐसे में उन्हें अब और आगे भविष्य में भी अपने उम्मीदवारों के लिए सपा समर्थन की आवश्यकता है।
                                           
क्या बुआ और भतीजे के बीच का यह सौदा अगले साल के आम चुनावों तक चलने में सक्षम होगा? यहाँ तक कि अगर यह सौदा नहीं टूटता है तब भी चुनाव के बाद क्या होगा? बने बसेरे पर कौन शासन करेगा? बुआ, भतीजा या नेताजी, हमें किनारे पर रहकर धैर्य से इंतज़ार करना होगा? मेरा अनुमान है कि बहनजी इस व्यवस्था में विजेता के तौर पर नज़र आएँगी।
                                                               
इन उप-चुनावों की सफलता बिहार चुनावों की प्रतिकृति है, जहाँ बीजेओ को हराने के एक उद्देश्य से पूरी तरह से दो अलग नेता नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव बिल्कुल विपरीत अलग एजेंडा वाली पार्टियाँ होते हुए भी साथ आए थे। चुनाव जीतने के बाद, दोनों नेताओं के आपसी भाईचारे का ढिंढोरा पूरे देश में पीटा गया और तब भी हम जानते हैं कि यह गठबंधन कितने समय तक चला था और कितनी जल्दी मि. क्लिन (श्री स्वच्छ), नीतीश कुमार को अहसास हो गया था कि राष्ट्रीय जनता दल के साथ बंधना उनकी कितनी बड़ी मूर्खता है।

दरअसल विपक्ष, नेताओं का पंचमेल समूह है, जो केंद्र में और पिछले दो दशकों में अपने राज्य में सत्ता के बदलते समीकरणों को देख चुका है। जहाँ तक मुझे याद आता है, रात्रि भोज कूटनीतिक प्रयास रहा है और जहाँ एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले फोटो खिंचवाना अच्छे प्रेस कवरेज के लिए होता है, और कोई भी उस खंजर को नहीं देख पाता है जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी पीठ पीछे थामे होता है।

राजनीतिक शक्ति जैसा उच्च अन्य कुछ नहीं है और यह प्रत्येक दल के कार्यकर्ताओं को जिस तरह से उत्साहित करता है वैसा और कुछ नहीं। पिछले कुछ दशकों से गठबंधन सरकारें भारत में मानदंड बन गई हैं और हमने नए मानदंडों भ्रष्टाचार, अक्षमता, राजनीतिक लामबंदी और राजनीतिक समझौता को स्थापित होते देखा है।
                  
मतदाता बहुत बुद्धिमान है और वह जानता है कि वह जिस दल को सत्ता में चाहता है उसे किस तरह से संदेश भेजा जा सकता है। वे जानते हैं कि अतीत में वे अब कभी उत्तर प्रदेश राज्य के भ्रष्टाचार और हिंसा से प्रभावित राजनीति के दौर में नहीं लौट सकते।

चुनाव विश्लेषक प्रवृत्तियों का विश्लेषण और ढोंग है कि उन्हें पता हैं कि क्या होने वाला है। पिछले कुछ चुनावों ने इसे साबित कर दिया है कि ये राजनीतिक पंडित कई बार सही होकर गलत होते हैं।

विपक्षी उत्साह थोड़े समय जीवित रहेगा जैसा कि पिछले कई चुनावों में हुआ है। भाजपा अविश्वसनीय रूप से कुशल चुनाव मशीनरी के साथ बहुत मजबूत दल है। कर्नाटक चुनाव आने वाले हैं और मुझे यकीन है कि भाजपा इसके लिए तैयारी कर रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर, क्या हम सचमुच तमाम विरोधाभासों, विवादों और अनिश्चितताओं के साथ यूपीए नामक ढाँचे का एक और शब्द चाहते हैं? क्या हम चाहते हैं कि गठबंधन में योगदान देने वाली सीटों की संख्या के आधार पर राजनीतिक दलों के लिए आकर्षक मंत्रालय तैयार किए जाएँ? हम इसे दस सालों से देख रहे हैं और मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा कि कई ऐसे लोग होंगे, जो यूपीए सरकार के कामकाज पर अपनी निराशा को व्यक्त करते हो। और अंत में, क्या हम वास्तव में गठबंधन धर्म पर एक और टिप्पणी सुनना चाहते हैं कि इस तरह के समझौते तो गठबंधन राजनीति में मानक हैं?
अरस्तू ने कहा था "एक चाह से ग्रीष्म नहीं आता (एक दिन की ख़ुशी से जीवन भर ख़ुश नहीं रहा जा सकता)" और सत्य से दूर कुछ भी नहीं होता है, जैसा कि लोकसभा चुनावों में दो सीटों के परिणामों से हम देख रहे हैं।

केवल चाहने से कुछ नहीं होता, वर्ष 1628 की एक पुरानी अंग्रेज़ी कविता के बड़े मानी शब्द हैं- “यदि इच्छाएँ घोड़े हो, तो भिकारी भी सवारी करेंगे। अगर शलजम किरिच हो तो मैं अपनी तरफ से एक पहनूँगा।यह आज राजनीतिक रूप से गलत भाषा है, लेकिन शब्दों से बने किसी भी अन्य वाक्य से यही बेहतर अर्थ बताती है!

इन उप चुनावों के परिणामों को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी के बारे में अभी से महालेख लिखना शुरू कर देना बहुत जल्दी और बहुत धृष्टतापूर्ण होगा।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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1 comment:

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