Thursday, 22 February 2018

नीरव मोदी - राजनीति बंद करे और जवाबदेही तलाशे



नीरव मोदी घोटाला की ख़बर बने लगभग एक हफ़्ता हो गया है।
                                
छोटे पर्दे पर इसे लेकर सैकड़ों बार बहस हो गई। प्रिंट मीडिया पर इस बारे में हज़ारों स्तंभ छप गए। विशेषज्ञों के इस मुद्दे पर अपने विचार थे जिसे लेकर उन्होंने अपनी राय भी दी और अंगुलियाँ भी उठीं। मुख़बिरों ने दोहराया “मैंने तो पहले ही कहा था”। राजनेताओं और पत्रकारों ने पिछले दस सालों का भंडा फोड़ा, हर किसी के पास सूचनाओं के ऐसे तीर-कमान थे जो किसी ओर की पहुँच से दूर थे। अंतत: गुस्साए टीवी एंकरों ने “देश यह जानना चाहता है” के नाम से चिल्लाना शुरू कर दिया, उन्हें लग रहा था कि ऐसा करने से उन्हें अपने चैनल के लिए ज़्यादा दर्शक मिल जाएँगे।

इन सारी बहसों का मुख्य मुद्दा क्या है? काँग्रेस, भाजपा को दोषी मानती है और भाजपा, काँग्रेस को दोष देती है कि उसने अपराधी के साथ “मिली भगत” कर उसे 11,000  करोड़ रुपए चुराकर रफूचक्कर होने में मदद की। वे यह सब केवल इस उम्मीद में कर रहे हैं कि इससे मतदाताओं के दिलोदिमाग पर अपनी कुछ जगह बना सकें और उन्हें आने वाले कई चुनावों के लिए लुभा सकें, जो कि वर्ष 2018 में होने वाले हैं, जो लोकसभा चुनावों की ओर ले जाएँगे। क्षेत्रीय दलों ने भी इस उम्मीद में प्राइम टाइम का कुछ हिस्सा अपनी झोली में डालने की कोशिश की है कि वे भी अपने नाम थोड़े "मतदाता अंक"  दर्ज कर सकें।

मोदी के नाम का दुरुपयोग करने और आरोप मढ़ने से इस गंभीर मामले को सुलझाने में कोई मदद नहीं मिलेगी। यह केवल भाजपा को कठोर शब्दों में प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर करने जैसा है। राजनीतिज्ञों में से कोई भी इसके नतीजों और अन्य घोटालों से हमारी अर्थव्यवस्था की विश्वसनीयता और स्वास्थ्य पर होने वाले दीर्घकालिक प्रभावों पर विचार नहीं कर रहा है।

हर कोई यह भी जानता है कि आने वाले कुछ दिनों में इसका गुबार उतर जाएगा क्योंकि और कोई “ब्रेकिंग न्यूज़” ऊपर आ जाएगी और नीरव मोदी और उसका घोटाला पिछले पन्नों पर चला जाएगा या फिर भूला दिया जाएगा। इस सारे शोर में प्रभावित बैंक, लेखा परीक्षक, इन बैंकों के सतर्कता विभाग और नियामकों से उम्मीद की जाना चाहिए कि वे निगरानी, विनियमन और शासन के लिए जो काम सबसे पहले करना ज़रूरी है, उसे जारी रखेंगे। घोटाला करने वाला अपराधी नीरव मोदी और उसकी थैली के चट्टे-बट्टे इस बीच बड़े आराम से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आलीशान होटलों में विराजमान हैं।

पर क्या कोई उन चुनौतियों को देख पा रहा है जिनका सामना बैकिंग प्रणाली कर रही है? 

यह हमारे राजनैतिक दलों के सामने इस तरह के गंभीर मुद्दों पर आपसी संकीर्ण मतभेदों को अलग रखने और देश हित में निम्नलिखित प्रश्नों पर एक साथ आने का समय है। उन्हें जवाबदेही तय करने और यदि कुछ बैंकों में लगता है कि कुछ सड़ा-गला है तो उसे कुचलने की आवश्यकता है।

1.    बैंक आधिकारिक की जवाबदेही- कोई अधिकारी कई पासवर्ड बनाकर उनके ज़रिए कैसे काम करता रहा और समझ पत्र (लैटर ऑफ़ अंडरस्टेंडिंग) की तारीख़ आगे कैसे बढ़ाता रहा? बैंक के ऐसे विनियमित वातावरण में वरिष्ठ अधिकारी कहाँ ग़ायब थे और कनिष्ठ कर्मचारी तब क्या कर रहे थे जब उन्हें दस्तावेज तैयार करने और अपलोड करने के लिए कहा गया? किसी के लिए यह कैसे संभव हुआ कि वह बनते कोशिश हर जांच और बैलेंस को बाईपास करता रहे, जिसे निश्चित ही सही जगह पर होना था? बैंक अधिकारी पहली बार पर्याप्त जमानत न होने पर भी एलओयू (लैटर ऑफ़ अंडरटेकिंग) जारी करने के लिए कैसे सहमत हो सकता है और नियमित अंतराल के बाद लगातार बिना किसी की नज़र में आए कोई इनका नवीकरण कैसे करता चला गया? अधिकारी इस तमाम लेन-देन को स्विफ़्ट (एसडब्ल्यूआईएफटी- सोसाइटी फ़ॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फ़ाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन) से कैसे छिपा पाएँ?

2.   बैंक प्रबंधन की जवाबदेही- पंजाब नेशनल बैंक भारत का दूसरा सबसे बड़ा पीएसयू (पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग- सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम) बैंक है। यह समझना मुश्किल है कि इन एलओयू की कोई रिपोर्ट नहीं बनी और कोर बैंकिंग प्रणाली में ये ऑर्डर (आदेश) नहीं दिख पाए? क्या अन्य बैंक कर्मचारियों के साथ भी साँठ-गाँठ थी जो पूरे रास्ते को एकदम सही तरीके से ढँकते चले जा रहे थे? बैंक के शीर्ष पर बैठे बड़े-बड़े  महानुभव क्या कर रहे थे? क्या निदेशकों के बोर्ड स्तर पर इतने बड़े जोखिम का प्रबंधन करने की कोई व्यवस्था नहीं थी? जमानत के साथ देनदारियों का मिलान करने की क्या कोई प्रणाली नहीं है?

3.    अन्य बैंकों के बैंक प्रबंधन की जवाबदेही- कई अन्य बैंक भी इन बड़ी रकमों की पुनर्वित्त में शामिल थे जो खुद होकर इस भंडाफोड का हिस्सा बने थे। ये बैंक उनकी अपनी आंतरिक नियंत्रण प्रणालियाँ का क्या कर रहे थे? उनकी नियंत्रण प्रणालियों के लिए कौन जिम्मेदार था? या कि इन सारी बैंकों ने पीएसयू के अपने दूसरे भाई बैंक के “रबर के मोहरे” पर आँख मूँदकर विश्वास कर लिया और कोई सवाल नहीं पूछा?

4.    आंतरिक लेखा परीक्षकों की जवाबदेही- हर बैंक का अपना वृहत आंतरिक लेखा परीक्षा विभाग होता है जो आवधिक लेखा परीक्षा का संचालन करता है और  उसकी सीधी रिपोर्ट अध्यक्ष या उससे भी बढ़कर बोर्ड के निदेशक को करता है। यह विभाग 7 वर्षों तक क्या कर रहा था? क्या उस विभाग के लोग भी इसमें शामिल थे या क्या वे अपनी नौकरी ठीक से बजाने में पूरी तरह अक्षम थे?

5.   बाह्य लेखा परीक्षकों की जवाबदेही- तिमाही, छमाही और वार्षिक लेखापरीक्षा बाह्य लेखा परीक्षकों द्वारा आयोजित की जाती हैं जो खातों के वास्तविक चित्र को "सही और निष्पक्ष" तरीके से बताते हुए हस्ताक्षर करते हैं। वे क्या कर रहे थे? संभवतः वे सबसे ज्यादा दोषी हैं क्योंकि उनके लिए पुस्तकों में गहरे उतरकर हर छोटे-बड़े विवरण को देखना अनिवार्य था।      एक अन्य मामले में, एक प्रमुख लेखा फर्म को सीमा तक खदेड़ा गया जिसके लिए अधिकारियों को निंदा तक झेलनी पड़ी। क्या ऐसा ही पंजाब नेशनल बैंक के बाहरी लेखा परीक्षकों के लिए नहीं किया जाना चाहिए था?

6.   भारतीय रिज़र्व बैंक की जवाबदेही- हमारे देश में बैंकिंग के अंतिम प्राधिकरण के रूप में, विश्व के सबसे अच्छे प्रबंधित सेंट्रल बैंकों में से एक भी चूक गया। बैंकों से सेंट्रल बैंक को रिपोर्टिंग की क्या आवश्यकताएँ हैं और ऐसे मामलों में, यदि कोई कार्रवाई होती है, तो वह क्या की जाती है?

जाहिर है, किसी एक बैंक के एक विभाग में नहीं बल्कि कई बैंकों के कई विभागों में प्रणालीगत विफलता रही है। ऐसे लोगों की लंबी श्रृंखला है जो मिलीभगत से अपराध को अंजाम देते हैं और इस श्रृंखला की बघिया को कहीं न कहीं उधेड़नी ही होगी, स्पष्ट जवाबदेही तय कर अपराधियों के खिलाफ सख़्त से सख़्त कार्रवाई करनी होगी। जहाँ कमज़ोरियाँ नज़र आ रही है और बैंकिंग प्रणाली में जहाँ विश्वास भुरभुरा हो गया है, वहाँ स्पष्ट और ठोस जवाब स्थापित करने होंगे, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि जितनी जल्दी हो सके इससे निपटा जाएँ।

जबकि बैंकों को संख्या की सुभीता है, क्योंकि इतने सारे लोग शामिल हैं, यह भी सोचना होगा कि क्या नीरव मोदी हिमखंड का केवल सिरा है और इस तरह के या दूसरे कई घोटाले पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों की बैलेंस शीट के "दबाव में" छिपे हुए हैं। हमारे सामने पहले से ही रोटोमैक और विक्रम कोठारी की एक अलग कहानी तैयार हो रही है, जहाँ डिफ़ॉल्ट (अप्राप्य) राशि 2,900 करोड़ रुपए से अधिक तक पहुंच गई है!

निष्कर्ष जो भी हो, कार्रवाई बहुत तेज होनी चाहिेए ताकि जो लोग भविष्य में भी कभी बैंकों को धोखा देने के बारे में सोचे तो वे एक बारगी इसे गंभीर निवारक के रूप में अवश्य देख लें। इस बारे में किसी भी तरह का विलंब टालमटोल या कमज़ोर पड़ जाना जाँच के उद्देश्य को परास्त कर देगा और पहले से ही निंदक मतदाता जाँच एजेंसियों पर विश्वास करना बंद कर देगा। यदि ऐसा न हुआ तो जो आम धारणा है कि हमारे देश में धनी किसी भी चीज से बच निकलता है, वह बड़ी आसानी से और भी प्रबलित होती रहेगी।
                                                  
और इसके बाद यदि  यह पाया गया कि कुछ राजनीतिक दल इसमें शामिल थे,  तो हमें अपने दोषी राजनेताओं को नहीं बख़्शना चाहिए। तब तक, मेरा राजनेताओं से अनुरोध है कि पेशेवरों को अपना काम करने देना चाहिए। एक दूसरे पर दबाव डालते रहने से बैंकों और जाँचकर्ताओं पर दबाव कम हो जाता है। यदि इस घोटाले के ज़रिए किसी राजनीतिक लाभ की आवश्यकता है, तो उन्हें जाँच एजेंसियों को अपना कार्य पूरा करने देना चाहिए और अगली चुनावों से पहले अपराधियों को गिरफ़्तार करना चाहिए।
                               
इसके जवाब तत्काल मिलने की आवश्यकता है, इससे पहले कि नीरव मोदी एक और माल्या बन जाएँ। देरी केवल कानूनी लड़ाई में जांच एजेंसियों को बांधे रखने का काम कर सकती है जबकि वह व्यक्ति दुनिया की परवाह किए बिना अपनी शानदार जीवन शैली को बनाए रखना जारी रखेगा।

जब मैं यह लेख लिख रहा था, समाचार पत्रों में एक समाचार छपा देखा, जिसमें कहा गया है कि नीरव मोदी ने यह कहते हुए पंजाब नेशनल बैंक को लिखा है कि उनकी जल्दबाजी और आतंक ने बैंक की वसूली की किसी भी संभावना को खतरे में डाल दिया है। उसने पहले ही 11,000 करोड़ रुपए में से 5,000 करोड़ रुपए की राशि लौटा दी है। उसका दावा है कि बैंक ने निरंजन मोदी ब्रांड को नष्ट कर दिया है। उसके वकील का दावा है कि अब तक कुछ भी साबित नहीं हुआ है। नीरव मोदी ने कहा है कि "पीएनबी ने हर बात सार्वजनिक कर देने से बकाया राशि के सभी विकल्पों को बंद कर दिया है।"

यह जले पर नमक छिड़कने जैसा होगा यदि पंजाब नेशनल बैंक को नीरव मोदी ब्रांड के विनाश के लिए 11,000 करोड़ रुपए के नुकसान के दावे का कोई कानूनी नोटिस मिल जाता है! मुझे हैरत तो तब होगी अगर ऐसी कानूनी नोटिस पहले से ही मेल में नहीं हो!!



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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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Monday, 19 February 2018

Nirav Modi – Stop Politics and Seek Accountability



Almost one week is over since the Nirav Modi scam made news.

Hundreds of television debates have taken place. Thousands of columns of newsprint have been printed. Experts have opined on the issues and given opinions or pointed fingers. Whistle bolwers have said “I told you so”. Politicians and journalists have pulled out data from the past 10 years and everyone has come “armed” with information that no one else has access to. Finally, outraged television anchors are screaming “nation wants to know” in the hope of getting more eyeballs for their channels.

What is the main point of these debates? The Congress blames the BJP and the BJP blames the Congress for “colluding” with the perpetrator and helping him to steal and flee over Rs 11,000 crores. All that is hoped for by these parties is to try and score some points in the minds of the voters who they hope to woo in the many elections that are coming up in 2018, leading up to the Lok Sabha Elections. The regional parties are also trying to grab some prime time in the hope that they too will notch up a few “voter points”.

Misusing the Modi name and making allegations is not helping resolve this serious matter. It is simply forcing the BJP to react in the strongest possible terms. None of the politicians are thinking of the repercussions this and other scams can have on the long term credibility and health of our economy.

Everyone also knows that this crescendo will die out in the next few days as another “breaking news” surfaces and Nirav Modi and his scam will be relegated to the back pages or forgotten. In all this noise the affected banks, the auditors, the vigilance departments of these banks and the regulator are hopefully continuing with the work that should have done in the first place, which is to monitor, regulate and to govern. The perpetrators of the fraud, Nirav Modi and his band of merry men are happily ensconced in luxury hotels in different parts of the World.

But is anyone looking at the challenges that the banking system is faced with?

It is time for our political parties to set aside their parochial differences on such serious issues and address the following questions together in the interest of the country. They need to seek accountability and stem the rot that seems to exist in some banks.

1.     Accountability of the Bank Official - How did one official continue to manage the relationship with multiple passwords and how did he keep extending the Letters of Understanding? In such regulated environments, where were his seniors and what were his juniors doing when they were asked to prepare and upload the documents? How did he manage to bypass every possible checks and balance that surely must be in place? How did he agree to open the LOU’s without sufficient collateral for the first time and how did he manage to keep renewing LOU’s at regular intervals without anyone else noticing? How did he hide these transactions from SWIFT?

2.   Accountability of the Bank Management – Punjab National Bank is the second largest PSU Bank of India. It is difficult to understand that no reports were generated for these LOU’s and that the orders did not show up in the core banking system. Was there collusion with other bank employees who covered up the trail so effectively? What was the huge hierarchy of the bank sitting on top doing? Was there no system to manage such large exposures at the level of the Board of Directors? Is there no system of tallying liabilities with collateral?

3.     Accountability of Bank Management of other Banks – Several other banks were also involved in the refinancing of these large amounts leading to their own exposure. What were these banks doing with their own internal control systems? Who was responsible for their control systems? Or is it that all banks simply trust the “rubber stamp” of another brother PSU bank, no questions asked?

4.  Accountability of the Internal Auditors – Every bank has a large internal audit department which is supposed to conduct periodic audits and report directly the Chairman or at best to the Board of Directors. What was this department doing for 7 long years? Were they also involved or were they simply incompetent in doing their job?

5.     Accountability of the External Auditors – Quarterly, half yearly and Annual audits are conducted by the external auditors who sign off stating the accounts represent a “true and fair” picture. What were they doing? They are possibly the most culpable since they are mandated to go into every detail of the books. In another matter, a major accounting firm has been pushed to the limit leading to a censure from the authorities. Should this not be done for the External Auditors for Punjab National Bank?

6.     Accountability of the Reserve Bank of India – As the final authority on banking in our country, one of the best managed Central Banks in the World, has also slipped up. What are the reporting requirements from the banks to the Central Bank and what action, if any, is taken in such matters?

Clearly, there has been a systemic failure, not just in one department of one bank but in many departments in many banks. There is chain of people who are complicit and this chain reeds to be unraveled, clear accountability pinpointed and the strongest possible action taken against the culprits. Clear and cogent answers will establish where the weaknesses are and given the brittleness of trust in the banking system, it is critical resolve this as soon as possible.

While there is comfort in numbers for the banks since so many are involved, it is also worrying to think whether Nirav Modi is just the tip of the iceberg and if there are many more similar or other scams hidden in the already “under pressure” balance sheets of the public sector banks. We already have another developing story in Rotomac and Vikram Kothari where the default amounts have reached in excess of Rs 2,900 crores!

Whatever the findings, action has to very swift and must be seen as a severe deterrent to anyone planning to defraud banks in the future. Any delay, procrastination or weakness here will defeat the purpose of the investigation and an already cynical electorate will stop believing the investigative agencies. The general view that the wealthy can get away with anything in our country will simply get reinforced further,

And if after this it is found that some political parties were involved, we should not spare our guilty politicians. Till then, my request to the politicians is to let professionals do their work. Blaming one another simply eases the pressure on the banks and the investigators. If political mileage is needed from this scam, they should push the investigating agencies to complete their task and arrest the culprits before the next elections.

Answers are needed urgently before Nirav Modi too becomes another Mallya. Delays will only result in tying down the investigating agencies in legal battles while the individual will continue to maintain his luxurious lifestyle without a care in the World.

As I write this article, there is a news item in the newspapers stating that Nirav Modi has written to the Punjab National Bank stating that their hurry and panic has led to the bank jeopardising any possibility of a recovery. He has already reduced the amount due from him from Rs 11,000 crores to Rs 5,000 crores. He claims that the bank has destroyed brand Nirav Modi. His lawyer claims that nothing has been proven so far. Nirav Modi has stated that “PNB has closed all options of recovering dues by going public.”

It would add insult to injury if Punjab National Bank receives a legal notice claiming damages of Rs 11,000 crores for the destruction of the Nirav Modi brand! I would be surprised if such a legal notice is not already in the mail!!


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The author is the founder Chairman of Guardian Pharmacies. A keen political observer, he is an Angel Investor and Executive Coach. He is the author of 5 best-selling books, Reboot. Reinvent. Rewire: Managing Retirement in the 21st Century; The Corner Office; An Eye for an Eye; The Buck Stops Here - Learnings of a #Startup Entrepreneur and The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur.

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Thursday, 8 February 2018

1/30 को # पीओटीयूएस का # एसओटीयू भाषण


                                               
इस लेख के शीर्षक से उलझ गए न ?

यह लेख हाल ही में 30 जनवरी 2018 को संपन्न हुए "संयुक्त राज्य अमेरिका " के राष्ट्रपति के "स्टेट ऑफ़ द यूनियन" अभिभाषण, उसके प्रभाव और भारत में उसी तरह की जिन चुनौतियों का हम सामना कर रहे हैं, उन समानताओं के बारे में है।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने व्याख्यान में सारे सही तार छेड़े। मैंने सितंबर 2016 में एक लेख लिखा था, जिसकी रूपरेखा में मैंने कहा था कि क्यों मेरा विश्वास है कि ट्रम्प चुनाव जीतेंगे और मुझे अभी भी विश्वास है कि वे हर वह चीज़ मुहैया कराएँगे जिसका उन्होंने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था। अतीत में हमने जिस ट्रम्प को देखा था उससे यह अलग था। अब वह कम आक्रामक और अधिक समावेशी था। यह पूरी तरह साफ़ है कि उनके लिए वह सब जो मायने रखता है, वह उनका देश है।

उन्होंने अमेरिका में बड़े निवेशों के बारे में बात की (ऐप्पल, क्रिसलर और माज़दा जैसी कंपनियों को एक-एक कर बाहर कर दिया), करों में कमी, बुनियादी ढाँचे के लिए अमेरिकी डॉलर $ 1.3 ट्रिलियन का निवेश, आप्रवासन और रक्षा बलों तथा अन्य सेवाओं जैसे सीमा रक्षक, पुलिस बलों और अग्निशमन सेवा को मजबूत करने के बारे में कहा। उन्होंने अपने लंबे अभिभाषण में कई ऐसे लोगों का स्थान-स्थान पर उदाहरणों के साथ बहुत अच्छी तरह से जिक्र किया, जिन्हें ध्यानपूर्वक चुना गया था और इस व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने देश के नागरिकों की सुरक्षा की आवश्यकता पर पर्याप्त समय चर्चा की। उन्होंने अमेरिकी युवाओं की अगली पीढ़ी को प्रशिक्षित करने के लिए व्यावसायिक स्कूलों की स्थापना करने की बात की।

उन्होंने विस्तार से दवाइयों की लागत और इन लागतों को जल्द ही कम करने की अपनी योजना के बारे में बताया। उन्होंने उनके राष्ट्रगान और उनके राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करने की आवश्यकता का भी उल्लेख किया। उनकी बातों को रिपब्लिकन बेंच द्वारा लगातार और कई बार, हालाँकि, अनिच्छा से डेमोक्रेटिक बैंच द्वारा सराहा गया। उन्होंने देश से कई चुनौतियों का सामना करने के लिए द्विपक्षीय दृष्टिकोण की मांग की।

जैसे-जैसे वे कहते गए, मैं उसे भारतीय संसद के साथ समानांतर रूप से देखने की कोशिश करता गया। क्या हमारे प्रधानमंत्री संसद में ऐसा लंबा भाषण दे सकेंगे, जिसमें विपक्षी दलों की भारी चुनौतियाँ और हड़बड़ी कर अचानक किसी भी निर्णय पर पहुँचने वाले या वॉक आउट (बाहर चले जाना) करने वालों का झुंड आड़े न आएँ? क्या विपक्षी, इतनी सारे उपलब्धियों के लिए भले ही अनिच्छा से लेकिन प्रधानमंत्री और इस सरकार की कभी सराहना करते हैं?

विश्लेषक लगभग सभी चैनलों पर उनके भाषण को खंगालने में लगे थे और मुझे पूरा यकीन था कि सुबह के समाचार पत्रों में के पन्ने भी उनके भाषण पर अलग-अलग लोगों के पक्ष और प्रतिपक्ष के विचारों से भरे होंगे। आलोचक उस बारे में बात करेंगे जो उन्होंने कहा ही नहीं, बजाए इसके कि जो कहा गया, उस पर बात करें। यहाँ ऐसा राष्ट्रपति है जो अपने देश के लिए अपनी पूरी ऊर्जा लगाने पर एकाग्र हो रहा है और विश्व को नेतृत्व प्रदान करने से दूर जा रहा है। उनका "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (अमेरिका को फिर से महान बनाओ)" नारा अपने मतदाताओं से अपील करता है लेकिन बाकी पूरी दुनिया के लोगों को हिला देता है, जो पहले नेतृत्व प्रदान करने के लिए अमेरिका की ओर देखने और यदि घटनाएँ योजनाओं के मुताबिक न हो, तो बाद में उसे कोसने के आदी हो गए हैं।

भारत में हम जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, वे बहुत अलग नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री को भी इस तरह के उच्च अभिमानी नेताओं और पत्रकारों के छोटे समूह का सामना करना पड़ता है, जिनका एकमात्र उद्देश्य प्रधानमंत्री द्वारा किए गए हर कार्य और उनके द्वारा उच्चारित हर शब्द की आलोचना करना है। मोदी की चुनौतियाँ बहुत अधिक हैं। न केवल उनके सामने विपक्षी दलों के आक्रामक समूह हैं, जिनसे उनकी व्यापक असमानताओं के चलते द्विदलीय चेहरे को प्रस्तुत करने की उम्मीद नहीं कर सकते, वे व्यवसायों के समर्थन या नामकरण के बारे में कभी सोच भी नहीं सकते क्योंकि उन्हें कभी भी किसी व्यवसाय समूह के साथ नहीं पहचाना जा सकता है।

भारत को भी अपनी अर्थव्यवस्था में बुनियादी ढाँचे के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है। हमें अधिक और बेहतर सड़कों और बेहतर सार्वजनिक यातायात व्यवस्था की आवश्यकता है। हमें और अधिक हवाई अड्डों और नदी परिवहन की आवश्यकता है। हमें स्वच्छ ऊर्जा और साफ़ हवा की जरूरत है। हमें बेहतर स्वास्थ्य देखभाल और सस्ती दवाइयों और बेहतर शैक्षिक सुविधाओं की जरूरत है। हमें आम जनता के लिए सस्ते आवास की ज़रूरत है। हमें अपनी सीमाओं पर अधिक नियंत्रण की आवश्यकता है (जी, हमारे यहाँ पूर्व दिशा के पड़ोसी देश से हमारे देश में अवैध आप्रवासियों की एक बड़ी समस्या है)। हमारे देश में हर साल 27 मिलियन बच्चों की संख्या जुड़ जाती है, ऐसे में हमें और अधिक नौकरियों के निर्माण के लिए मजबूत और अवधारित नीतियाँ चाहिए। मेक इन इंडिया के दर्शन के समर्थन और उसे प्रेरित करने की जरूरत है क्योंकि केवल तब ही हम अपने लोगों के लिए वर्धित मूल्य की नौकरियों को पैदा कर पाएँगे।

हमें अपने रक्षा बलों के लिए अधिक सम्मान की आवश्यकता है साथ ही हमें भारतीय सेना के खिलाफ़ दर्ज होने वाले बेहूदा एफ़आईआर को रोकना होगा। पश्चिमी सीमा के  हमारे अति आक्रामक पड़ोसी पर लगाम कसने के लिए हमें एक मज़बूत नीति बनाने की आवश्यकता है और इसके लिए हमें अपने शस्त्रों और सशस्त्र बलों को अधिक सुविधाएँ मुहैया कराने की ज़रूरत है। हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रमों का केवल इसलिए समर्थन नहीं करना है कि हम “मंगल ग्रह पर पहुँचना” चाहते हैं बल्कि इसलिए समर्थन देना है क्योंकि इस तकनीक से अधिक विश्वसनीय रक्षा क्षमताओं को विकसित करने में मदद मिलती है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हर आने वाले राजनेता ने "रोटी, कपड़ा, मकान" का वादा किया और अमीरों और गरीबों के बीच का अंतर बढ़ता चला गया। रोज़गार देने की आड़ में कतिपय लोगों के लिए बहुत कुछ किया गया, जिन्होंने विशाल धन जमा कर लिया। हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हमारे देश के " वंचितों" जिनमें कृषि मजदूर, कारख़ानों में काम करने वाले श्रमिक, भारत के ग्रामीण और अर्ध शहरी इलाकों में रहने वाले लोग और वे लोग जिन्हें पिछली सरकारों की उदारता का कभी कोई लाभ न मिला हो, ऐसे  लोग आते हैं, उन्हें भी इस देश में अवसर उपलब्ध हो सकें क्योंकि यह देश हम सबका है।

हमें अपनी सहस्त्राब्दियों और उससे परे तक के लिए अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है, जो लोग अगले कुछ दशकों में हमारे देश को शक्ति देंगे। यह सब केवल मजबूत और प्रतिबद्ध नेतृत्व द्वारा ही संभव हो सकता है, जिसकी भले ही आलोचना हो, लेकिन वह तब भी तमाम कठिन सुधारों का पालन करवा सके।

हमें आवश्यकता है कि राष्ट्रों की मंडली में भारत को उसकी सही जगह मिल सकें। हमें दक्षिण एशिया और विश्व में नेतृत्व प्रदान करने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें एक मजबूत और स्थायी विदेश नीति की आवश्यकता है।

जैसा कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपना भाषण "भगवान भगवान भला करे अमेरिका का" के साथ समाप्त किया था,मुझे विस्मय होगा अगर प्रधान मंत्री मोदी ने ऐसा कोई कथन कहा तो क्या होगा! अगर उन्होंने ऐसा कहा तो उपद्रव मच जाएगा कि वे "कौन-से भगवान" का उल्लेख कर रहे थे और किन चुनिंदा श्रोताओं के लिए उन्होंने "आशीर्वाद" माँगा था।

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लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं. वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं.

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